हर नाकामी का ठीकरा युद्ध पर फोड़ देना आसान है… लेकिन सवाल ये है कि अगर हर समस्या की जड़ सिर्फ़ युद्ध है, तो फिर पिछले दस साल की नीतियों की ज़िम्मेदारी कौन लेगा?

आजकल टीवी स्टूडियो से लेकर सोशल मीडिया तक एक ही लाइन दोहराई जा रही है — “रुपया गिरा क्योंकि युद्ध हो गया… विदेशी निवेश भागा क्योंकि दुनिया में अस्थिरता है… तेल महंगा हुआ क्योंकि जंग चल रही है…”
लेकिन ज़रा ठंडे दिमाग़ से सोचिए।
क्या दुनिया में युद्ध सिर्फ़ भारत के लिए हुआ था?
क्या बाकी देशों की अर्थव्यवस्थाएँ किसी दूसरे ग्रह पर थीं?
और अगर हर चीज़ का कारण सिर्फ़ युद्ध है, तो फिर सरकारें होती किसलिए हैं?
1. रुपया इतना कमज़ोर क्यों हुआ? क्या युद्ध सिर्फ़ भारत पर हुआ था?
अगर युद्ध ही हर बर्बादी की वजह है, तो फिर सवाल ये है कि
* देश में निवेश कितना आ रहा है
* एक्सपोर्ट कितना बढ़ रहा है
* सरकार का वित्तीय अनुशासन कैसा है
* बेरोज़गारी और महंगाई कितनी है
* विदेशी निवेशकों का भरोसा कितना बचा है
अगर लगातार निवेश घट रहा हो, मैन्युफैक्चरिंग का ढांचा कमजोर हो, आयात बढ़ते जाएँ और सरकार सिर्फ़ इवेंट मैनेजमेंट करती रहे, तो करेंसी दबाव में आएगी ही।
युद्ध ने असर डाला — इसमें बहस नहीं।
लेकिन हर गिरावट को युद्ध पर डाल देना ऐसा है जैसे घर की छत दस साल से टपक रही हो और आदमी बारिश को दोष देता रहे।
2. FII और FPI पिछले कई सालों से पैसा क्यों निकाल रहे हैं?
सबसे बड़ा सवाल यही है।
अगर वजह सिर्फ़ युद्ध है, तो विदेशी निवेशक 2020 से पहले भी पैसा क्यों निकाल रहे थे?
विदेशी निवेशक भावनाओं पर नहीं चलते, डेटा पर चलते हैं।
उन्हें चाहिए:
* नीति में स्थिरता
* टैक्स सिस्टम में भरोसा
* संस्थाओं की स्वतंत्रता
* न्यायिक पारदर्शिता
* बिज़नेस का अनुमानित माहौल
लेकिन यहाँ क्या दिखा?
* अचानक टैक्स फैसले
* रेगुलेटरी अनिश्चितता
* सरकारी दखल का डर
* बेरोज़गारी के आंकड़ों पर सवाल
* उपभोग क्षमता में गिरावट
ऊपर से शेयर बाज़ार कुछ बड़े कॉर्पोरेट घरानों के इर्द-गिर्द घूमता दिखे, तो निवेशक सतर्क हो जाते हैं।
युद्ध एक ट्रिगर हो सकता है,
लेकिन पाँच साल की पूँजी निकासी को सिर्फ़ युद्ध कह देना आधा सच नहीं, पूरा भ्रम है।
3. चाबहार पर अरबों खर्च करके पीछे क्यों हटे? रूस-ईरान से सस्ता तेल क्यों छोड़ा?
ये सवाल सिर्फ़ विदेश नीति का नहीं, रणनीतिक समझ का भी है।
Chabahar Port को इसलिए महत्वपूर्ण माना गया था क्योंकि इससे भारत को पाकिस्तान को बायपास करके अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुँच मिलती थी।
और सबसे बड़ी बात — तेल सप्लाई के मामले में यह रणनीतिक सुरक्षा देता था।
लेकिन हुआ क्या?
* वर्षों तक धीमी प्रगति
* अमेरिकी दबाव के आगे झुकाव
* ईरान से तेल आयात लगभग बंद
* रूस से तेल लेने पर भी “अनुमति” वाली मानसिकता
सवाल उठता है:
अगर भारत “विश्वगुरु” और “रणनीतिक महाशक्ति” है, तो अपनी ऊर्जा नीति वॉशिंगटन देखकर क्यों तय करता है?
दुनिया के बड़े देश अपने हित देखते हैं।
भारत को भी वही करना चाहिए था।
रूस से यूरोप ने भी अलग-अलग रास्तों से व्यापार जारी रखा,
लेकिन यहाँ जनता को राष्ट्रवाद का भाषण मिला और नीति में निर्भरता बढ़ती गई।
4. पासपोर्ट रैंकिंग क्यों गिरती रही? इसका युद्ध से क्या लेना-देना?
Indian Passport की ताकत सिर्फ़ देशभक्ति के नारों से नहीं बढ़ती।
उसके पीछे दुनिया का भरोसा होता है।
पासपोर्ट मजबूत तब होता है जब:
* देश की अर्थव्यवस्था भरोसेमंद हो
* संस्थाएँ मजबूत हों
* विदेश नीति संतुलित हो
* नागरिकों की वैश्विक साख अच्छी हो
अगर अंतरराष्ट्रीय मीडिया में लगातार ध्रुवीकरण, धार्मिक तनाव, प्रेस फ्रीडम और संस्थागत कमजोरी की खबरें जाएँ, तो असर पड़ता है।
युद्ध का इससे सीधा संबंध नहीं है।
ये लंबे समय की शासन शैली का परिणाम होता है।
असली खेल क्या है?
आज हर आलोचना को “राष्ट्रविरोध” कह देना आसान बना दिया गया है।
अगर रुपया गिरे — युद्ध।
अगर बेरोज़गारी बढ़े — युद्ध।
अगर निवेश भागे — युद्ध।
अगर तेल महंगा हो — युद्ध।
मतलब सरकार कभी ज़िम्मेदार ही नहीं?
लोकतंत्र में सवाल पूछना गुनाह नहीं होता।
असल देशभक्ति अंधभक्ति नहीं, जवाबदेही मांगना होती है।
और सबसे दिलचस्प बात ये है कि
जो लोग हर बात पर “70 साल” गिनाते थे,
अब खुद पूरे दस साल की जवाबदेही से बचने के लिए हर वैश्विक संकट की आड़ ले रहे हैं।
आख़िरी बात
युद्ध ने असर डाला — बिल्कुल डाला।
लेकिन अच्छी सरकार वही होती है जो संकट में भी देश को संभाले।
पेट्रोल डीज़ल के दाम इतने वर्षों तक अंतरराष्ट्रीय मार्केट में आधे से भी कम थे, तब भी तो सरकार और पेट्रोलियम कंपनियों के खूब पैसा कमाया था, आज बढ़ रहे हैं तो उन्हें यह बोझ क्यों नहीं उठाना चाहिए?
और अगर हर असफलता के लिए हमेशा कोई बाहरी दुश्मन चाहिए, तो फिर “मजबूत नेतृत्व” का दावा किस बात का?
देश गोदी मीडिया के ज़रिए सेट किए गए नेरेटिव और टीवी डिबेट से नहीं चलता।
देश चलता है मज़बूत अर्थव्यवस्था, दूरदर्शी विदेश नीति, भरोसेमंद संस्थाओं और ईमानदार जवाबदेही से।
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