कोई दोस्त है न रक़ीब है,
तेरा शहर कितना अजीब है
[ रक़ीब = दुश्मन ]
वो जो इश्क़ था वो जुनून था,
ये जो हिज्र है ये नसीब है
[ हिज्र = विरह ]
यहाँ किसका चेहरा पढ़ा करूं,
यहाँ कौन इतना करीब है
मै किस से कहूं मेरे साथ चल,
यहाँ सब के सर पे सलीब है
क्या ये बात ब्लागिंग के शहर पर भी सटीक बैठती है…
राणा सहरी
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डॉक्टर साहिब ने बहुत सही फरमाया है.
हारिये न हिम्मत,बिसारिये न हरि नाम.
ईद की बधाई और शुभकामनाएँ,खुशदीप भाई.
वो जो इश्क़ था वो जुनून था,
ये जो हिज्र है ये नसीब है
सच में इश्क जूनून जैसा ही होना चाहिए, और हिज्र? उसकी परवाह क्यों
बेहतर संकलन और प्रस्तुति !!
वो जो इश्क़ था वो जुनून था,
ये जो हिज्र है ये नसीब है ।
हाल अपना भी यही है आजकल,
वो जो मिलते थे तबीयत से, नज़र चुराते हैं ।
अंतत: मनुष्य को परम सत्य का दर्शन हो ही जाता है, देर सबेर ही सही, पर जीवन इतना भी निराशाजनक नहीं की उससे उबर ही ना सके.
रामराम.
एक एक वाक्य सटीक बैठता है..
रियल लाईफ के लोंग ही यहाँ ब्लॉगिंग करते हैं , समाज का वही चेहरा तो यहाँ भी नजर आता है , कुछ अपने , कुछ बेगाने ….इसमें उदासी कैसी !
टिप्पणियों की डोज तो डाक्टर साहब ने पूरी कर दी. चलिए अब प्रसन्न चित्त हो जाइये और खुश(दीप) टाइप पोस्ट लगाइए .
🙂
बीमारी के बाद अक्सर मूड थोडा लो रहता है . ऐसे में मूड लाईट करना चाहिए .
ग़ज़ल बहुत अच्छी है , एकदम सटीक .
एक आध टिप्पणी शायद स्पैम में चली गई है .
आज इतना बस इसलिए लिख दिया — क्योंकि यह विषय अक्सर हमें सोचने पर मजबूर करता रहता है . सोचता हूँ — जब ब्लॉगिंग नहीं करते थे तब भी तो जिंदगी चल रही थी . क्या खराब थी ? अब आदत सी पड़ गई है . लेकिन अपने ऊपर हावी न होने दें , यही कोशिश रहती है . वर्ना लगेगा , सब कुछ जानते हुए भी आखिर मार खा ही गए . लेकिन एक बात हमेशा महसूस की है — अति हर चीज़ की ख़राब होती है . इसलिए एक बेलेंस बनाना ज़रूरी होता है . ब्लॉगिंग स्वांत: सुखाय करें , जब दिल न कहे तब छोड़ दें — यही सही लगता है .
ब्लॉगिंग क्या है — एक खेल ही तो है . एक बार नशा चढ़ता है लेकिन फिर आँख खुलने पर उतर जाता है . एक ब्लॉगर जो अपनी मेहनत से कम समय में ही बहुत लोकप्रिय हो गए थे ( टिप्पणियों की संख्या अनुसार ) , एक दिनं खुद ही यह कह कर सन्यास ले लिया — रोज १५ -१६ घंटे ब्लॉगिंग को दिए , आखिर क्या मिला !
ब्लॉग गुरु दूसरों को इस धंधे पर लगाकर स्वयं गायब हो गए — इसका अर्थ यही है — और भी ग़म हैं ज़माने में .
वैसे भी , जब खून के रिश्तों को निभाना ही आसान नहीं रहा , तब इन आभासी रिश्तों से क्या उम्मीद की जा सकती है .
उम्मीद रखना भी व्यर्थ है .
बेशक ब्लॉगजगत भी ऐसा ही है .
आखिर है तो एक आभासी दुनिया ही .
खुशदीप भाई —
जब हम हँसते हैं , तब दुनिया साथ हंसती है .
जब हम रोते हैं , तब कोई साथ नहीं देता !
यही दुनिया का दस्तूर है .
क्या हो गया, सब ठीक है ना ! आजकल कुछ ऐसी ही बातें हमारे दिलोदिमाग में भी घुमड़ रही हैं ।
यही सच है यहाँ…..
अच्छी ग़ज़ल के साथ सत्योक्ति (कटोक्ति)भी कह दी है आपने .कृपया यहाँ भी तवज्जो दें –
शनिवार, 11 अगस्त 2012
कंधों , बाजू और हाथों की तकलीफों के लिए भी है का -इरो -प्रेक्टिक
क्या बात है खुशदीप भाई सब खैरियत???? 🙂 🙂 🙂
साँची सर जी
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सच ऐसा ही है यहाँ -बस टिप्पणियों का लेनदेन भर है !