उफ़ ………कितना वीभत्स सत्य है ………कब समझेंगे हम अन्न की कीमत ………बहुत पहले एक विज्ञापन आया करता था जिसमे अन्न की कीमत दर्शायी जाती थी जब कृष्ण द्रौपदी के बरतन से एक चावल का दाना खाते हैं और उस मे तृप्त हो जाते हैं ………कि अन्न के एक एक दाने की कितनी महत्ता है मगर ना जाने हम लोग कब ये समझेंगे?
भयंकर है। हिले इसलिए नहीं कि मैने इससे बड़ी गरीबी देखी है। मैने देखा है लोगों को जानवर के मल से गेहूँ के दाने बीनते और इस प्रकार जुटाये अन्न से दो रोटी खाते हुए।
और कम से कम भारत जैसे देश में ऐसी हर मौत के लिए सीधे सीधे घोटालेबाज नेताओं और जमाखोर पूंजीपतियों को जिम्मेदार ठहरा के उन पर हत्या का मुकदमा चलाया जाना चाहिए
फिल्मकार ने एक हकीकत को अंजाम दिया है। लेकिन यह विभत्स हकीकत अधूरी है। इतने लोग धरती पर भूख से इसलिए नहीं मरते कि कुछ लोग जरूरत से अधिक खाते हैं। बल्कि इस लिए कि धरती पर मानवोपयोगी पदार्थों का वितरण उचित और न्यायिक रीति से नहीं होता। मुझे पता है कुछ साल पहले मेरे ही नगर में एक भाई ने अपनी दो बहनों की जान इसी भूख के कारण ले ली थी। उस के खिलाफ मुकदमा चला लेकिन उस ने पहले ही दिन स्वीकार कर लिया कि उस ने अपनी बहनों की हत्या का अपराध किया है। हर हाथ को काम और मुहँ को रोटी का जमाना तभी आएगा जब हम चाहेंगे।
त्रासद स्थिति है।
उफ़ ………कितना वीभत्स सत्य है ………कब समझेंगे हम अन्न की कीमत ………बहुत पहले एक विज्ञापन आया करता था जिसमे अन्न की कीमत दर्शायी जाती थी जब कृष्ण द्रौपदी के बरतन से एक चावल का दाना खाते हैं और उस मे तृप्त हो जाते हैं ………कि अन्न के एक एक दाने की कितनी महत्ता है मगर ना जाने हम लोग कब ये समझेंगे?
अन्न के लिये तरसते गरीब, अन्न का तिरस्कार करते अमीर..
भयंकर है। हिले इसलिए नहीं कि मैने इससे बड़ी गरीबी देखी है। मैने देखा है लोगों को जानवर के मल से गेहूँ के दाने बीनते और इस प्रकार जुटाये अन्न से दो रोटी खाते हुए।
बहुत पहले देखी थी सच मे हिल गये थे…
और कम से कम भारत जैसे देश में ऐसी हर मौत के लिए सीधे सीधे घोटालेबाज नेताओं और जमाखोर पूंजीपतियों को जिम्मेदार ठहरा के उन पर हत्या का मुकदमा चलाया जाना चाहिए
hadd hai..:(
वाकई
खुशदीप भाई, मैंने बिलकुल यही हालत अपने देश में देखी है… दावत के बाद भूखे बच्चों को ज़मीन से उठाकर खाते हुए देखकर रोना आ गया था…
उफ्फ्फ अभी भी कितने लोग भर पेट खाना नहीं खा पाते हैं….
…….
……..
फिल्मकार ने एक हकीकत को अंजाम दिया है। लेकिन यह विभत्स हकीकत अधूरी है। इतने लोग धरती पर भूख से इसलिए नहीं मरते कि कुछ लोग जरूरत से अधिक खाते हैं। बल्कि इस लिए कि धरती पर मानवोपयोगी पदार्थों का वितरण उचित और न्यायिक रीति से नहीं होता। मुझे पता है कुछ साल पहले मेरे ही नगर में एक भाई ने अपनी दो बहनों की जान इसी भूख के कारण ले ली थी। उस के खिलाफ मुकदमा चला लेकिन उस ने पहले ही दिन स्वीकार कर लिया कि उस ने अपनी बहनों की हत्या का अपराध किया है। हर हाथ को काम और मुहँ को रोटी का जमाना तभी आएगा जब हम चाहेंगे।
उफ्फ्फ….वाकई ..
सचमुच , हिला कर रख दिया !
जूठा छोड़ने वालों पर ज़ुर्माना होना चाहिए .
कहीं कहीं कुत्ते भी इंसान से बेहतर जीवन जीते हैं .