गुरुदेव समीर लाल समीर जी की हाल ही में विमोचित हुई उपन्यासिका…देख लूँ तो चलूँ… 21 जनवरी को मेरे लखनऊ जाने से पहले ही डाक के ज़रिए मुझे मिल गई थी…उपन्यासिका को... Read more »
कल की पोस्ट पर लखनऊ में सरदार बच्चे के सामने मिमियाते दो सांडों का ज़िक्र किया था..सभी ने इस पोस्ट को अपने अंदाज़ से लिया…लेकिन मेरे उस अनुरोध पर लखनऊ के किसी... Read more »
कल की पोस्ट के वादे के मुताबिक आपको दो सांडों के चूहा बनने का आंखों देखा हाल सुनाऊंगा…लेकिन पहले महागुरुदेव अनूप शुक्ल की पोस्ट से बिना अनुमति लेकिन साभार लिया हुआ एक... Read more »
मुस्कुराइए कि आप लखनऊ में हैं… या लखनऊ हम पर फिदा, हम फिदा-ए-लखनऊ, किसमें है दम इतना, कि हम से छुड़वाए लखनऊ… वाकई लखनऊ की बातें लखनऊ वाले ही जानते हैं…इस शनिवार... Read more »
पिछले पांच दिनों में गणतंत्र के सफ़र के कुछ पहलुओं को आप तक पहुंचाने की कोशिश की…इस तरह की पोस्ट पर तात्कालिक सफ़लता बेशक न मिले लेकिन इनका महत्व कालजयी रहता है…नेट... Read more »
1987 से 1997 के दौर में ही देश ने मंडल-कमंडल की राजनीति को पूरे उफ़ान पर देखा.. 16 जुलाई 1987 को पूर्व वित्त मंत्री आर वेंकटरमन देश के अगले राष्ट्रपति बने। वेंकटरमन के कार्यकाल... Read more »
11 फरवरी 1977 को फ़खरूद्दीन अली अहमद के आकस्मिक निधन के बाद नीलम संजीवा रेड्डी जनता पार्टी के राज में राजनीतिक सर्वसहमति से देश के राष्ट्रपति बने। ऐसा पहली बार हुआ कि देश में... Read more »
दूसरे राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन नेहरू की तरह राजनेता नहीं थे। नेहरू से उलट राधाकृष्णन धार्मिक प्रवृत्ति के थे। नेहरू राधाकृष्णन की काबलियत का सम्मान करते थे, लेकिन कई मौकों पर दोनों... Read more »
कल की कड़ी में आपने पढ़ा था कि किस तरह गणतंत्र के तौर पर भारत में सरकार चलाने की व्यवस्था का चुनाव किया गया था…आज की किस्त में पढ़िए पहले राष्ट्रपति डॉ... Read more »
ये सवाल वाकई मुझसे किसी ने पूछा था…उस सज्जन के लिए 26 जनवरी का महत्व शायद एक छुट्टी तक ही सीमित था…और त्योहारों की छुट्टी की तरह वो 26 जनवरी, 15 अगस्त और 2 अक्टूबर... Read more »